- बुवाई का समय (रबी फसल)
- गेहूं की उन्नत एवं अधिक उपज देने वाली किस्में
- रासायनिक खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
- कीट एवं रोग नियंत्रण
फसल श्रेणियाँ
मुख्य अनाज फसलें
- गेहूं
- जौ
- जई
- बाजरा
- मक्की
- धान
पशु चारा फसलें
- ज्वार
- बरसीम
- नेपियर हाइब्रिड
- गिन्नी घास
- रागी
- ग्वार
- मकचरी
- शफतल
तेल उत्पादन वाली तिलहन फसलें
- मूंगफली
- सरसों
- सूरजमुखी
- सोयाबीन
- अलसी
प्रोटीन युक्त दलहन फसलें
- हरी-मूंग
- मसूर
- अरहर
- उड़द
- चने
- राजमा
रेशेदार व शर्करा फसलें
- कपास
- जूट
- पटसन
- अलसी
- गन्ना
- खजूर
मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने वाली हरी खाद फसलें
- ढैंचा
- लोबिया
- सन / सनई
- मूंग
बागवानी
औषधीय पौधे
- अश्वगंधा
- आंवला
- तुलसी
- नीम
- बहेड़ा
- बेल
- ब्राह्मी
- मुलेठी
- शतावरी
- सफेद मूसली
- सर्पगंधा
- शंखपुष्पी
- भूमि आंवला
सुगंधित पौधे
- पुदीना
- लेमन ग्रास
- सोया (डिल)
- स्टीविया
- वचा (स्वीट फ्लैग)
रोपण फसलें
- चाय
- कॉफी
- रबर
- नारियल
- सुपारी
- काजू
प्रमुख पुष्प
- गुलाब
- गेंदा
- ग्लैडियोलस
- जरबेरा
- रजनीगंधा
- गुलदाउदी
- चमेली
- गुलनार
फलदार फसलें
उष्णकटिबंधीय फल
- आम
- केला
- पपीता
- चीकू
- जामुन
- खजूर
उपोष्णकटिबंधीय फल
- अमरूद
- अनार
- लीची
- संतरा
- किन्नू
- माल्टा
- बेर
- शहतूत
समशीतोष्ण फल
- सेब
- नाशपाती
- आड़ू
- आलूबुखारा
- लोकाट
साइट्रस फल
- संतरा
- किन्नू
- माल्टा
बेलदार / जमीन पर उगने वाले फल
- तरबूज
- खरबूजा
प्रमुख मसाला फसलें
मसाला
- अदरक
- हल्दी
- धनिया
- मेथी
- सौंफ
- जीरा
- काली मिर्च
सब्जी फसलें
जड़ एवं कंद सब्जियां
- पालक
- लेट्यूस
- सेलेरी
पत्तेदार सब्जियां
- आलू
- गाजर
- मूली
- चुकंदर
- शलगम
- शकरकंदी
- अरबी
फल वाली सब्जियां
- टमाटर
- बैंगन
- मिर्च
- चुकंदर
- शिमला मिर्च
- भिंडी
कद्दू वर्गीय सब्जियां
- लौकी
- कद्दू
- करेला
- खीरा
- ककड़ी
- टिंडा
गोभी वर्ग
- पत्ता गोभी
- फूल गोभी
- ब्रोकली
अन्य
- प्याज
- लहसुन
- मटर
- मशरूम
वानिकी फसलें
वन फसलें
- पॉपलर
- सफेदा
- सागवान
- धरेक
सामान्य जानकारी
भारत के कुल फसली क्षेत्र का लगभग 13 प्रतिशत भाग गेहूं की खेती के अंतर्गत आता है। धान के बाद गेहूं भारत की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है। यह विशेष रूप से उत्तर एवं उत्तर-पश्चिम भारत के करोड़ों लोगों का मुख्य भोजन है।
गेहूं पोषक तत्वों से भरपूर होता है, जिसमें प्रोटीन, विटामिन तथा कार्बोहाइड्रेट पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं, जिससे यह संतुलित आहार प्रदान करता है।
उत्पादन की दृष्टि से भारत विश्व में रूस, अमेरिका और चीन के बाद चौथा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है और विश्व के कुल गेहूं उत्पादन में लगभग 8.7 प्रतिशत योगदान देता है।
प्रसिद्ध किस्में एवं पैदावार
1. सिंचित एवं समय पर बुवाई वाली प्रमुख किस्में
- PBW 752
देरी से बोई जाने वाली किस्म, सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त।
👉 औसत पैदावार: 19.2 क्विंटल/एकड़ - PBW 1 Zn
पौधे की ऊँचाई लगभग 103 सेमी, 151 दिनों में तैयार।
👉 पैदावार: 22.5 क्विंटल/एकड़ - UNNAT PBW 343
समय पर बुवाई हेतु उपयुक्त, 155 दिन में पकती है।
👉 जल जमाव, करनाल बंट व ब्लाइट के प्रति सहनशील
👉 पैदावार: 23.2 क्विंटल/एकड़ - WH 542
सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त, धारी जंग व पत्ती जंग प्रतिरोधी
👉 पैदावार: 20 क्विंटल/एकड़ - PBW 725
बौनी किस्म, दाने मोटे व सख्त
👉 पीला व भूरा जंग प्रतिरोधी
👉 पैदावार: 23 क्विंटल/एकड़ - PBW 677
160 दिन में पकने वाली किस्म
👉 पैदावार: 22.4 क्विंटल/एकड़ - HD 2851
126–134 दिन में पकती है, ऊँचाई 80–90 सेमी
2. उच्च गुणवत्ता एवं विशेष उपयोग वाली किस्में
- WHD 912
बेकरी उपयोग हेतु उपयुक्त (प्रोटीन ~12%)
👉 रोग प्रतिरोधी
👉 पैदावार: 21 क्विंटल/एकड़ - HD 3043
अच्छी ब्रेड बनाने हेतु उपयुक्त
👉 रोग प्रतिरोधी
👉 पैदावार: 17.8 क्विंटल/एकड़
3. अधिक पैदावार देने वाली लोकप्रिय किस्में
- WH 1105
ऊँचाई ~97 सेमी, 157 दिन में तैयार
👉 पैदावार: 23.1 क्विंटल/एकड़ - PBW 660
अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त
👉 पैदावार: 17.1 क्विंटल/एकड़ - HD 3086 (Pusa Gautam)
उच्च उत्पादन एवं बेहतर गुणवत्ता
👉 पैदावार: 23 क्विंटल/एकड़ - HD 2967
ऊँचाई ~101 सेमी
👉 पैदावार: 21.5 क्विंटल/एकड़ - DBW 17
155 दिन में तैयार
👉 पैदावार: 23 क्विंटल/एकड़
4. पंजाब क्षेत्र में प्रचलित किस्में
- PBW 621 – 158 दिन, रोग प्रतिरोधी
- UNNAT PBW 550 – 145 दिन, पैदावार 23 क्विंटल/एकड़
- TL 2908 – 153 दिन, अधिकांश रोगों के प्रति प्रतिरोधी
- PBW 175 – 165 दिन, करनाल बंट प्रतिरोधी
- PBW 527 – 160 दिन, रोग प्रतिरोधी
- WHD 943 – 154 दिन
- PDW 291 / PDW 233 – कई रोगों के प्रति प्रतिरोधी
- PBW 590 / PBW 509 / PBW 373 – जल्दी पकने वाली एवं रोग प्रतिरोधी किस्में
5. अन्य राज्यों की प्रमुख किस्में
- RAJ 3765
120–125 दिन, गर्मी व रोग सहनशील
👉 पैदावार: 21 क्विंटल/एकड़ - UP 2338 / UP 2328
130–135 दिन, सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त
👉 पैदावार: 20–22 क्विंटल/एकड़ - Sonalika
जल्दी पकने वाली, पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त - Kalyansona
छोटे कद की किस्म, लेकिन फंगस के प्रति संवेदनशील - UP 368 / WL 711 / UP 319
उच्च पैदावार एवं रोग प्रतिरोधी किस्में
6. देर से बोई जाने वाली प्रमुख किस्में
👉 HD 293, RAJ 3765, PBW 373, UP 2338, WH 306, HD 1025
अतिरिक्त महत्वपूर्ण बिंदु (Added Value)
- गेहूं की किस्म चुनते समय ध्यान दें:
✔ बुवाई का समय (समय पर / देर से)
✔ सिंचाई की उपलब्धता
✔ क्षेत्र की जलवायु
✔ रोग प्रतिरोधक क्षमता
मिट्टी (गेहूं के लिए उपयुक्त)
गेहूं की खेती के लिए चिकनी दोमट या नहरी मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि यह आवश्यक मात्रा में नमी को सोखकर बनाए रखती है।
इसके अतिरिक्त, ऐसी भारी मिट्टी वाले क्षेत्र भी गेहूं उत्पादन के लिए उपयुक्त होते हैं जहाँ पानी के निकास (ड्रेनेज) की उचित व्यवस्था हो।
जलवायु
तापमान
विकास के लिए उपयुक्त तापमान: 21°C – 26°C
बुवाई
बुवाई के समय तापमान 18°C – 22°C
वर्षा
न्यूनतम आवश्यक वर्षा: 👉 20 – 25 सेमी अधिकतम उपयुक्त वर्षा: 👉 लगभग 75 सेमी
कटाई
कटाई के समय तापमान: 20°C – 25°C
ज़मीन की तैयारी
प्रारंभिक जुताई
- पिछली फसल की कटाई के तुरंत बाद खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए।
- यह जुताई आमतौर पर ट्रैक्टर और तवा (Disc Harrow) की सहायता से की जाती है।
- गहरी जुताई से
✔ खरपतवार नष्ट होते हैं
✔ मिट्टी भुरभुरी बनती है
✔ कीट व रोग कम होते हैं
द्वितीयक जुताई (Secondary Tillage)
- पहली जुताई के बाद खेत को 2–3 बार हल या कल्टीवेटर से जोतना चाहिए।
- हर जुताई के बाद पाटा (Leveller) लगाकर मिट्टी को समतल किया जाता है।
👉 उद्देश्य:
- मिट्टी को बारीक बनाना
- नमी को संरक्षित रखना
- बीज के लिए उपयुक्त बेड तैयार करना
जुताई का सही समय
- खेत की जुताई शाम के समय करना अधिक लाभकारी माना जाता है।
- जुताई के बाद खेत को पूरी रात खुला छोड़ देना चाहिए ताकि मिट्टी ओस (Dew) से नमी सोख सके।
अंतिम तैयारी (Final Seed Bed)
- बुवाई से पहले खेत:
✔ समतल (Levelled) होना चाहिए
✔ ढेले रहित (Clod-free) होना चाहिए
✔ पर्याप्त नमी युक्त होना चाहिए
👉 अच्छा बीज-बेड = बेहतर अंकुरण + समान वृद्धि
अतिरिक्त महत्वपूर्ण बिंदु (Added Value)
✔ यदि खेत में नमी कम हो तो बुवाई से पहले हल्की सिंचाई (Pre-irrigation) करें।
✔ अधिक कठोर मिट्टी में रोटावेटर का उपयोग प्रभावी रहता है।
✔ खेत में जल निकास (Drainage) की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।
✔ ज़ीरो टिलेज (Zero Tillage) तकनीक से समय, लागत और नमी की बचत होती है।
बिजाई
बुवाई का समय
- गेहूं की बुवाई का आदर्श समय:
👉 25 अक्टूबर से नवंबर के मध्य तक - समय पर बुवाई के लाभ:
✔ बेहतर अंकुरण
✔ अधिक पैदावार
✔ रोगों का कम प्रकोप - देरी (पिछेती) बुवाई के नुकसान:
❌ पैदावार में कमी
❌ दाने छोटे रह जाते हैं
❌ गर्मी का असर जल्दी पड़ता है
कतारों का फासला (Row Spacing)
- समय पर बुवाई:
👉 20 – 22.5 सेमी - देरी से बुवाई:
👉 15 – 18 सेमी
👉 सही दूरी रखने से पौधों को पर्याप्त पोषण, प्रकाश और हवा मिलती है।
बीज की गहराई (Seed Depth)
- उचित गहराई:
👉 4 – 5 सेमी
👉 बहुत गहराई में बीज डालने से अंकुरण कमजोर होता है, जबकि बहुत ऊपर रखने से नमी की कमी हो सकती है।
बुवाई की विधियां (Methods of Sowing)
- सीड ड्रिल / बिजाई मशीन
👉 सबसे बेहतर और वैज्ञानिक तरीका
👉 समान दूरी और गहराई सुनिश्चित करता है - छींटा विधि (Broadcasting)
👉 पारंपरिक तरीका
👉 कम नियंत्रित, पैदावार अपेक्षाकृत कम - जीरो टिलेज ड्रिल (Zero Tillage)
👉 बिना जुताई के बुवाई
👉 समय, लागत और नमी की बचत - रोटावेटर द्वारा बुवाई
👉 खेत को एक साथ तैयार कर बुवाई
👉 तेज और आधुनिक तरीका
अतिरिक्त महत्वपूर्ण बिंदु (Added Value)
✔ बीज की मात्रा (Seed Rate):
👉 सामान्यतः 40–50 किग्रा प्रति एकड़
✔ बीज उपचार (Seed Treatment):
👉 फफूंदनाशक (जैसे कार्बेन्डाजिम) से उपचार करने से रोग कम होते हैं
✔ नमी की स्थिति:
👉 बुवाई के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए
✔ लाइन बुवाई हमेशा बेहतर:
👉 निराई-गुड़ाई और खाद प्रबंधन आसान होता है
बीज
बीज की मात्रा (Seed Rate)
- सामान्यतः गेहूं के लिए:
👉 45 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ - देरी से बुवाई (पिछेती):
👉 बीज की मात्रा बढ़ाकर 50–55 किग्रा/एकड़ करें
👉 बीज हमेशा:
✔ साफ, शुद्ध और प्रमाणित (Certified) होना चाहिए
✔ रोग एवं कीट रहित होना चाहिए
✔ उच्च अंकुरण क्षमता (85%+) वाला होना चाहिए
बीज उपचार (Seed Treatment)
बुवाई से पहले बीज का उपचार करना आवश्यक है, जिससे फफूंद और रोगों से बचाव होता है और अंकुरण बेहतर होता है।
👉 अनुशंसित फफूंदनाशी दवाइयाँ:
| दवाई का नाम | मात्रा (प्रति किलोग्राम बीज) |
|---|---|
| Raxil | 2 ग्राम |
| Thiram | 2 ग्राम |
| Vitavax | 2 ग्राम |
| Tebuconazole | 2 ग्राम |
बीज उपचार की विधि
- आवश्यक मात्रा में बीज लें
- दवाई को निर्धारित मात्रा में मिलाएं
- बीज को अच्छी तरह मिलाकर कोटिंग करें
- छाया में सुखाकर तुरंत बुवाई करें
अतिरिक्त महत्वपूर्ण बिंदु (Added Value)
✔ जैविक उपचार:
👉 ट्राइकोडर्मा (Trichoderma) 4–5 ग्राम/किग्रा बीज से उपचार करने पर रोग कम होते हैं
✔ अंकुरण परीक्षण:
👉 बुवाई से पहले बीज का अंकुरण टेस्ट करें
✔ नमी का ध्यान रखें:
👉 उपचार के बाद बीज को ज्यादा देर तक न रखें
✔ उन्नत किस्म का चयन करें:
👉 क्षेत्र और मौसम के अनुसार बीज चुनना जरूरी है
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
उर्वरक की अनुशंसित मात्रा (प्रति एकड़)
| उर्वरक (Fertilizer) | मात्रा |
|---|---|
| यूरिया (UREA) | 110 किग्रा |
| डीएपी (DAP) | 55 किग्रा |
| एमओपी (MOP) | 20 किग्रा |
| जिंक सल्फेट (Zinc) | 10–15 किग्रा (यदि कमी हो) |
👉 नोट: SSP का उपयोग करने पर DAP की जगह दिया जा सकता है (मिट्टी की जांच के अनुसार)
पोषक तत्वों की मात्रा (NPK) प्रति एकड़
| तत्व | मात्रा |
|---|---|
| नाइट्रोजन (N) | 50 किग्रा |
| फास्फोरस (P) | 25 किग्रा |
| पोटाश (K) | 12 किग्रा |
उर्वरक देने की विधि (Application Method)
1. बुवाई के समय (Basal Dose)
- पूरी फास्फोरस (DAP/SSP)
- पूरी पोटाश (MOP)
- नाइट्रोजन (यूरिया) का ½ भाग
👉 यह सब बुवाई के समय मिट्टी में मिला दें
2. टॉप ड्रेसिंग (Top Dressing)
- बचा हुआ ½ नाइट्रोजन (यूरिया)
👉 पहली सिंचाई (20–25 दिन बाद) के समय दें
अतिरिक्त महत्वपूर्ण बिंदु (Added Value)
✔ मिट्टी परीक्षण (Soil Testing):
👉 उर्वरक की सही मात्रा तय करने के लिए जरूरी
✔ जैविक खाद (Organic Manure):
👉 गोबर की खाद / कम्पोस्ट: 4–5 टन प्रति एकड़
✔ सल्फर की आवश्यकता:
👉 SSP उपयोग करने से सल्फर की पूर्ति हो जाती है
✔ सूक्ष्म पोषक तत्व:
👉 जिंक की कमी वाले क्षेत्रों में जिंक सल्फेट अवश्य दें
✔ संतुलित उर्वरक प्रयोग:
👉 केवल यूरिया का अधिक प्रयोग करने से उत्पादन घट सकता है
❗ Common Mistake (Important)
👉 सिर्फ यूरिया पर निर्भर रहना = गलत रणनीति
👉 NPK का संतुलन नहीं रखा = उपज घटेगी + मिट्टी खराब होगी
खरपतवार नियंत्रण
रसायनिक नियंत्रण (Chemical Control)
रसायनों द्वारा खरपतवार नियंत्रण सबसे प्रभावी और कम श्रम वाला तरीका है।
1. प्रारंभिक अवस्था (Pre-emergence)
- पैंडीमैथालीन (Pendimethalin)
👉 मात्रा: 1 लीटर/एकड़
👉 पानी: 200 लीटर - समय:
✔ बुवाई के 0–3 दिन के अंदर (बीज अंकुरण से पहले)
👉 यह दवा खरपतवार के बीजों को अंकुरित होने से रोकती है
2. चौड़े पत्तों वाले खरपतवार (Broadleaf Weeds)
- 2,4-D
👉 मात्रा: 250–300 मि.ली./एकड़
👉 पानी: 150 लीटर - समय:
✔ बुवाई के 30–35 दिन बाद
👉 यह दवा बथुआ, हिरनखुरी जैसे चौड़े पत्तों वाले खरपतवारों को नियंत्रित करती है
3. संकरी पत्ती वाले खरपतवार (Grassy Weeds)
- Isoproturon / Clodinafop / Sulfosulfuron
👉 मात्रा: दवा के अनुसार (लेबल देखें)
👉 ये गेहूं में उगने वाली घास जैसी खरपतवार (जैसे गुल्ली डंडा) को नियंत्रित करते हैं
यांत्रिक नियंत्रण (Mechanical Control)
- निराई-गुड़ाई (Hoeing)
- हाथ से खरपतवार निकालना
👉 छोटे खेतों में उपयोगी, लेकिन अधिक श्रम की आवश्यकता
एकीकृत खरपतवार प्रबंधन (Integrated Weed Management)
✔ रसायनिक + यांत्रिक दोनों का संयोजन
✔ समय पर बुवाई
✔ साफ और शुद्ध बीज का उपयोग
✔ उचित फसल चक्र (Crop Rotation) अपनाना
अतिरिक्त महत्वपूर्ण सावधानियां (Important Tips)
✔ दवा का छिड़काव शांत मौसम (कम हवा) में करें
✔ निर्धारित मात्रा से अधिक दवा न डालें
✔ स्प्रे के समय खेत में पर्याप्त नमी हो
✔ स्प्रे के बाद 6–8 घंटे तक बारिश नहीं होनी चाहिए
❗ Common Mistakes (Reality Check)
👉 गलत समय पर स्प्रे = दवा बेकार
👉 ज्यादा मात्रा = फसल को नुकसान
👉 खरपतवार की पहचान नहीं की = गलत दवा का उपयोग
सिंचाई प्रबंधन
सिंचाई का समय (Irrigation Schedule)
| सिंचाई संख्या | बुवाई के बाद समय (दिनों में) | अवस्था |
|---|---|---|
| पहली सिंचाई | 20–25 दिन | सहायक जड़ (CRI Stage) |
| दूसरी सिंचाई | 40–45 दिन | टिलरिंग (शाखा बनना) |
| तीसरी सिंचाई | 60–65 दिन | जोड़ बनना (Jointing) |
| चौथी सिंचाई | 80–85 दिन | फूल निकलना (Booting/Heading) |
| पांचवी सिंचाई | 100–105 दिन | दाना भरना (Milk Stage) |
| छठी सिंचाई | 115–120 दिन | पकने की अवस्था |
महत्वपूर्ण अवस्थाएं (Critical Stages)
👉 गेहूं में ये अवस्थाएं सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं:
- CRI Stage (20–25 दिन) – सबसे महत्वपूर्ण
- टिलरिंग अवस्था
- जोड़ बनना (Jointing)
- दूध अवस्था (Grain Filling)
❗ CRI अवस्था पर पानी की कमी = भारी पैदावार हानि
👉 शोध के अनुसार, पहली सिंचाई में हर सप्ताह की देरी से
➡️ 83–125 किग्रा/एकड़ तक उपज कम हो सकती है
मिट्टी के अनुसार सिंचाई
- भारी मिट्टी (Clay Soil):
👉 4–6 सिंचाई पर्याप्त - हल्की मिट्टी (Sandy Soil):
👉 6–8 सिंचाई आवश्यक
सीमित पानी में सिंचाई रणनीति
- केवल 1 सिंचाई उपलब्ध हो:
👉 CRI अवस्था (20–25 दिन) पर करें - 2 सिंचाई उपलब्ध हों:
👉 CRI + फूल आने की अवस्था - 3 सिंचाई उपलब्ध हों:
👉 CRI + जोड़ बनना + दूध अवस्था
अतिरिक्त महत्वपूर्ण बिंदु (Added Value)
✔ बुवाई से पहले प्री-इरिगेशन (Pre-irrigation) लाभदायक होता है
✔ खेत में जल जमाव न होने दें (Drainage जरूरी)
✔ स्प्रिंकलर/ड्रिप से पानी की बचत संभव
✔ सिंचाई हमेशा सुबह या शाम को करें
✔ अधिक पानी देने से जड़ सड़न और रोग बढ़ सकते हैं
❗ Common Mistakes (Reality Check)
👉 पहली सिंचाई देर से देना = सबसे बड़ी गलती
👉 जरूरत से ज्यादा पानी = उपज घटेगी + रोग बढ़ेंगे
👉 सभी खेतों में एक जैसा शेड्यूल लागू करना = गलत
पौधे की देखभाल (कीट एवं रोग प्रबंधन – गेहूं)
प्रमुख कीट एवं नियंत्रण
1. चेपा (Aphid)
- यह रस चूसने वाला कीट है, जो पत्तों और बालियों से रस चूसता है
- लक्षण:
✔ पत्ते पीले पड़ना
✔ समय से पहले सूखना - समय: जनवरी मध्य से मार्च तक
नियंत्रण:
✔ जैविक उपाय:
- क्राइसोपर्ला (Chrysoperla) प्रीडेटर
👉 5000–8000 प्रति एकड़ - नीम घोल: 50 मि.ली./लीटर पानी
✔ रासायनिक उपाय:
- थायमेथोक्साम: 80 ग्राम/एकड़
- इमिडाक्लोप्रिड: 40–60 मि.ली./एकड़ (100 लीटर पानी में)
2. दीमक (Termite)
- बीज अंकुरण से लेकर फसल पकने तक नुकसान
- लक्षण:
✔ पौधे सूखना
✔ जड़ें खोखली होना
✔ पौधा आसानी से उखड़ना
नियंत्रण:
- क्लोरपाइरीफॉस 20 EC
👉 1 लीटर/एकड़ (20 किलो मिट्टी में मिलाकर बुरकाव)
👉 बाद में हल्की सिंचाई करें
प्रमुख रोग एवं नियंत्रण
1. कांगियारी (Loose Smut)
- बीज जनित रोग
- लक्षण:
✔ बालियों में काला चूर्ण
नियंत्रण:
- वीटावैक्स (Carboxin): 2.5 ग्राम/किग्रा बीज
- कार्बेन्डाजिम: 2.5 ग्राम/किग्रा बीज
- टेबुकोनाज़ोल: 1.25 ग्राम/किग्रा बीज
- जैविक: ट्राइकोडर्मा 4 ग्राम/किग्रा बीज
2. सफेद धब्बा (Powdery Mildew)
- लक्षण:
✔ पत्तों पर सफेद फफूंदी
✔ बाद में काले धब्बे
नियंत्रण:
- घुलनशील सल्फर: 2 ग्राम/लीटर पानी
- कार्बेन्डाजिम: 400 ग्राम/एकड़
- गंभीर स्थिति:
👉 प्रोपीकोनाज़ोल: 2 मि.ली./लीटर पानी
3. भूरी कुंगी (Brown Rust)
- कारण: 15–30°C तापमान + नमी
- लक्षण:
✔ पत्तों पर लाल-भूरे धब्बे
नियंत्रण:
- ज़िनेब: 400 ग्राम/एकड़
- प्रोपीकोनाज़ोल: 2 मि.ली./लीटर पानी
4. पीली कुंगी (Yellow Rust)
- कारण: ठंडा मौसम (8–15°C)
- लक्षण:
✔ पत्तों पर पीली धारियां
नियंत्रण:
- मैनकोजेब: 2 ग्राम/लीटर पानी
- प्रोपीकोनाज़ोल: 2 मि.ली./लीटर पानी
- सल्फर: 5–10 किग्रा/एकड़ (डस्ट)
5. करनाल बंट (Karnal Bunt)
- बीज व मिट्टी जनित रोग
- अनुकूल स्थिति: फरवरी में नमी/बारिश
नियंत्रण:
- रोग-रोधी किस्मों का चयन
- फूल निकलने पर:
👉 प्रोपीकोनाज़ोल 2 मि.ली./लीटर पानी
समेकित प्रबंधन (IPM – Added Value)
✔ रोग-रोधी किस्मों का चयन करें
✔ बीज उपचार अनिवार्य करें
✔ फसल चक्र (Crop Rotation) अपनाएं
✔ संतुलित उर्वरक प्रयोग करें (अधिक नाइट्रोजन से बचें)
✔ समय पर निरीक्षण (Monitoring) करें
❗ Common Mistakes (Reality Check)
👉 कीट दिखने के बाद ही दवा डालना = देर हो चुकी होती है
👉 गलत दवा या गलत मात्रा = पैसा और फसल दोनों का नुकसान
👉 केवल रसायन पर निर्भर रहना = मिट्टी और पर्यावरण खराब
फसल की कटाई
कटाई का सही समय
- जब फसल के:
✔ पत्ते और तना पूरी तरह पीले होकर सूख जाएं
✔ बालियां कठोर हो जाएं
✔ दाने सख्त हो जाएं
👉 कटाई के समय दानों में लगभग 25–30% नमी होना उपयुक्त माना जाता है
कटाई में देरी के नुकसान
❌ दाने झड़ना (Shattering)
❌ पक्षियों और कीटों द्वारा नुकसान
❌ गुणवत्ता में कमी
❌ बाजार में कम कीमत
👉 इसलिए फसल को पूरी तरह सूखने से पहले ही काट लेना चाहिए
कटाई की विधियां (Methods of Harvesting)
1. हाथ से कटाई
- तेज धार वाली दरांती (Sickle) का उपयोग
- छोटे किसानों के लिए उपयुक्त
- श्रम अधिक लगता है
2. कंबाइन हार्वेस्टर (Combine Harvester)
- एक ही मशीन से:
✔ कटाई
✔ दाने निकालना (Threshing)
✔ सफाई (Cleaning)
👉 समय और श्रम की बचत, बड़े खेतों के लिए उपयुक्त
कटाई के बाद की प्रक्रिया (Post-Harvest Management)
✔ कटाई के बाद फसल को 2–3 दिन धूप में सुखाएं
✔ दानों की नमी घटाकर 10–12% करें (भंडारण हेतु)
✔ साफ और सूखी जगह पर भंडारण करें
✔ भंडारण से पहले कीट नियंत्रण उपाय अपनाएं
अतिरिक्त महत्वपूर्ण बिंदु (Added Value)
✔ सुबह या शाम के समय कटाई करना बेहतर रहता है
✔ बारिश के समय कटाई न करें
✔ देर से कटाई करने पर गिरने (Lodging) का खतरा बढ़ता है
✔ उच्च गुणवत्ता के लिए साफ-सफाई और ग्रेडिंग जरूरी है
❗ Common Mistakes (Reality Check)
👉 बहुत जल्दी कटाई = दाने अधपके
👉 बहुत देर से कटाई = दाने झड़ना + नुकसान
👉 भंडारण से पहले नमी न घटाना = फफूंदी लगना

